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Friday, December 28, 2012

अंधेरी सुबह


 अंधेरी सुबह 

है आँखो  में आंसू 
       होठ हैं बेसब्द 
करनी ने एक और मानव की ही 
    किया है पुरे समाज को स्तब्ध 

कोई कहता है ये पुलिस की नाकामी 
     किसी को लगती है ये सरकार की लाचारी 
कर सकते हैं ये आरोप प्रत्यारोप कल से 
    आज सुबह तो लगता है , थी ये मेरी ही जिम्मेवारी 

कहते  हैं समाज जिसे 
   ये मेरे  तुम्हारे सोच का ही तो किस्सा है  
अगर लुटती है एक इज्ज़त सरेआम 
   आपका मेरा भी तो उसमे लुटता एक हिस्सा  है 

अब जो टुटा है ये कहर इस कदर 
    देश सोया यूवा  जागे हैं 
हिंदुस्तान को सुरक्षित एवम भ्रस्टाचार रहित बनाने के 
    अब हमारे और भी पुख्ता इरादे हैं 

अगर आवाज़ नहीं उठाई इस बार 
   मानव कहलाने में  शर्म आएगी 
आज नहीं तो कल 
    एक और "हिन्दुस्तान की बेटी"  अपने प्राण गवाएगी ...

मनीष रंजन    






Wednesday, August 15, 2012

Tuesday, January 25, 2011

मुस्कान


सोचता है दिल क्यों लगती है ये राहे अनजान
    इस खिलखिलाहट में खो गयी वो मासूम मुस्कान
कर तो दिए खड़े ढेर रुप्यूओं के
   पर कह रह गयी हमारी तुम्हारी पहचान

वो छोटो छोटी खुशियाँ , वो लड़ना हमारा
  वक़्त बेवक्त फॉर वो रूठना मनाना हमारा
अब जो हमे फुर्सत का लम्हा मयस्सर नहीं  होता
  फीर किस्से रूठना और किसको मनाना , सोचता है दिल बेचारा


सोचता है दिल क्यों लगती है ये राहे अनजान 
    इस खिलखिलाहट में खो गयी वो मासूम मुस्कान


सीधी सी थि ये जिंदगी जब खुशियाँ हमे ढूंढती थी
  अब जो सोचु तो लगे हम खुशियाँ को ढूंढते है
मिलती थी जो ठंढक तुम्हारे पहलु में आँगन में बैठ के
   अब हम उस ठंढक को बाजारू बर्तनों में ढूंढते है
रहते तो है एक घर में एक ही छत के निचे
  फीर क्यों हम दो पाल की संगत को ढूंढते हैं 

मिले है जो ये दो पल , आओ बैठें बातें करें
    खोजे तो सही की किसने बनाया मुझको तुमसे  अनजान
जो सून सकें थोरा सा हम अपने दिल की तान
    चलो साथ ख़ोज लायें वो मासूम मुस्कान

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